मैं एक खुली, खाली सी सड़क पर चल रहा था और अचानक पीछे से स्पीड में एक रिक्शा आयी और मुझे ठोकर मार कर निकल ली. मैं गिर पड़ा.
सामने खड़ा एक ठेलेवाला मुझे हेल्प करने की बजाय ठहाके मार कर हसने लगा. ये उस रिक्शावाले से भी ज्यादा गया–गुजरा था.
मै गुस्से से बोला "साले बत्तीसी क्या फाड़ रहा हैं? कोई काम–धंधा नहीं हैं क्या?"
उसने बड़े सरकास्टिक टोन में जवाब दिया "साहब आप जैसे लोगों की मेहरबानी से इतना काम हैं की सांस लेने तक की फुरसत नहीं."
अव्वल नंबर का बदतमीज और सेडिस्ट इंसान था.
मै अपने आप से अपने पैरों पर खड़ा हुआ, और देखा की उसका सेब का ठेला था. पर दो–एक सेब को छोड़ कर बाकी सारे सेब सड़े–गले थे.
मैने हैरान हो कर जब उसकी तरफ देखा, तो उस बेशर्म इंसान ने फिर से अपनी बत्तीसी के दर्शन कराये. मेरा मन किया दो झापड़ रसीद दू साले को. पर मैं समझ गया ये कौन था. ये जरूर किसी पागल खाने से भाग कर आया था. पागलों के मुंह कौन लगे?
जैसे ही मैं जाने लगा और चार कदम आगे चला, कमीने ने मुझे पीछे से आवाज लगायी... उसी सरकास्टिक टोन में..."कैसे लगे फल?"
अब मेरे सब्र का बांध टूट गया. जैसे ही मैं गुस्से से उसकी तरफ मूड़ा, मेरी नजर अचानक उसके ठेले के बोर्ड पर पड़ी. उसके ठेले का नाम था – शनि फ्रूट वाला.
और वो मुझे देख कर फिर से मुस्कुराने लगा.
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